रायपुर: 11 फरवरी 2025 को छत्तीसगढ़ नगर निगम का चुनाव हुआ है। छत्तीसगढ़ की जनता ने इस दिन अपने मतों का प्रयोग करके अपने पसंदीदा उम्मीदवार को वोट दिया। 15 फरवरी 2025 को नतीजे का दिन है।
मगर क्या आपने कभी सोचा है कि वोटों की गिनती के बाद ईवीएम मशीनों को कहां रखा जाता है? अक्सर चुनाव के दौरान ईवीएम मशीन सुर्खियों में रहती हैं। कई बार ये भी देखा गया है कि गिनती के बाद चुनाव हारने वाली पार्टी ईवीएम के पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है, मगर दिलचस्प बात यह है कि जो पार्टी चुनाव जीतती है वो ईवीएम के बारे में कुछ नहीं बोलती। हालांकि, चुनाव आयोग हमेशा ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर आश्वस्त करता रहा है।
अब वापस उस सवाल पर आते हैं कि वोटों की गिनती के बाद ईवीएम मशीनों को कहां रखा जाता है? दरअसल, बहुत से लोगों को लगता है कि गिनती के बाद तो ईवीएम मशीनें अगले चुनाव की तैयारियों में लग जाती हैं, मगर ऐसा नहीं है। वोटों की गिनती के बाद ईवीएम मशीनों को 45 दिनों तक सुरक्षित स्ट्रांग रूम में रखा जाता है। अब बहुत से लोगों के दिमाग में होगा कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है? इसको समझने के लिए आपको ईवीएम से होने वाले मतदान की पूरी प्रक्रिया को समझना होगा। आइए समझते हैं।
सबसे पहले वोटिंग के दिन ईवीएम मशीनों को मतदान केंद्रों पर लगाया जाता है। शाम में मतदान समाप्त होने के बाद, इन मशीनों को सील करके स्थानीय स्ट्रांग रूम में ले जाया जाता है। स्ट्रांग रूम पुलिस की कड़ी सुरक्षा में रहता है और यहां हर कोने में सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं। मतगणना के दिन यानी वोटों की गिनती के दिन, स्ट्रांग रूम से ईवीएम मशीनों को मतगणना केंद्र पर ले जाया जाता है। यहां पर इन मशीनों को खोला जाता है और वोटों की गिनती की जाती है।
कैसा होता है स्ट्रांग रूम?
स्ट्रांग रूम एक बहुत सुरक्षित स्थान होता है, जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। स्ट्रांग रूम को इस तरह से तैयार किया जाता है कि वहां मौसम के तापमान का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है। वहां पर न तो गर्मी का असर होता है और न ही नमी का। बता दें कि स्ट्रांग रूम में ईवीएम मशीनों को सूटकेस में बंद करके रखा जाता है, जिससे वह पूरी तरह से सुरक्षित रहती हैं।
क्यों 45 दिनों तक सुरक्षित रखी जाती हैं EVM मशीनें?
वोटों की गिनती के बाद, ईवीएम मशीनों को वापस स्ट्रांग रूम में ले जाया जाता है और उन्हें 45 दिनों तक सुरक्षित रखा जाता है। इसके पीछे बड़ी वजह है कि अगर किसी उम्मीदवार को अपनी वोटों की गिनती पर संदेह होता है तो दोबारा काउंटिंग करवा सकता है। इसके लिए उम्मीदवार के पास 45 दिनों का समय होता है। 45 दिन गुजरने के बाद, इन मशीनों को निर्वाचन आयोग के गोदाम में भेज दिया जाता है।
जब 45 दिन गुजर जाते हैं तो ईवीएम मशीन को स्टोरेज रुम में रख दिया जाता है. स्टोरेज रूम में रखे जाने से पहले सारी पार्टी में से एक पार्टी का प्रतिनिधि स्टोरेज रुम में मौजूद होता है. जब दुबारा से लोकसभा और विधानसभा के चुनाव होता हैं तो स्टोरेज रुम से ईवीएम मशीनों को फिर से निकाला लिया जाता हैं. और चुनाव के लिए भेज दिया जाता है.
भारत में कब आई ईवीएम
दरअसल भारत में 1990 के दशक में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) आई थी और इसका चुनाव में सफल प्रयोग किया गया था. 90 के दशक में एक मशीन में करीब दो हजार वोट दिए गए थे. इलेक्शन कमीशन के मुताबिक 1400 वोट ही एक मशीन में दिए जा सकते हैं. चुनाव में मतदान के बाद ईवीएम मशीनों को स्ट्रांग रूम में रखावा दिया जाता है. ईवीएम मशीन की कड़ी सुरक्षा की जाती है. ईवीएम मशीन की कड़ी सुरक्षा में वहां दूसरी इलेक्ट्रॉनिक मशीन नहीं रखी जाती हैं. बहरहाल तक तक बल्ब भी नहीं लगाए जाते हैं.